झारखंड : समग्र विकास के लिए संसाधन

किसी भी समाज के विकास की पहली शर्त केवल संसाधनों की उपलब्धता नहीं होती। उससे पहले यह जरूरी होता है कि उस समाज को यह तय करने का अधिकार हो कि उसके संसाधनों और उसकी अर्थव्यवस्था की प्राथमिकताएं क्या होंगी।

आजादी से पहले भारत के सामने इसका एक बहुत कठोर उदाहरण था। 1943-44 में जब देश भुखमरी और मौतों का सामना कर रहा था, तब देश की आर्थिक व्यवस्था हमारे अपने हाथ में नहीं थी। शासन की प्राथमिकताएं कुछ और थीं और भारत अपनी प्राथमिकताएं स्वयं तय करने की स्थिति में नहीं था। आजादी इसलिए केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं थी; वह अपने विकास की दिशा स्वयं तय करने की स्वतंत्रता भी थी।

आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो यह परिवर्तन दिखाई देता है। एक समय भोजन के संकट से जूझने वाला देश आज ऐसी स्थिति में पहुंच चुका है कि कोविड जैसी अभूतपूर्व आपदा के बाद भी लगभग 80 करोड़ लोगों तक खाद्यान्न पहुंचाने की क्षमता रखता है। यह केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उस आर्थिक और संस्थागत क्षमता की यात्रा का संकेत है जो देश ने लंबे समय में बनाई है।

इसी यात्रा को हमें झारखंड के संदर्भ में भी देखना चाहिए।

2000 में अलग राज्य बनने के बाद झारखंड के पास पहली बार अपने संसाधनों, अपनी आवश्यकताओं और अपनी प्राथमिकताओं को अपने तरीके से तय करने का अवसर आया। अब सवाल यह है कि इस अवसर का उपयोग हमने किस तरह किया है और आगे किस तरह कर सकते हैं।

देश की अर्थव्यवस्था जिस दिशा में आगे बढ़ी है, उसमें 2014 के बाद बुनियादी सुविधाओं के विस्तार से लेकर तकनीक के उपयोग, बिजली, गैस, राजमार्ग, भारतमाला और GST जैसी व्यवस्थाओं तक कई बदलाव हुए हैं।  “सबका साथ, सबका विकास” से लेकर “विकसित भारत 2047” तक की यात्रा एक बड़े आर्थिक परिवर्तन की दिशा बताती है। झारखंड इस यात्रा से अलग नहीं रह सकता। उसे अपनी परिस्थितियों के अनुसार इसमें अपनी भूमिका तय करनी होगी।

और यहीं से हमारे सामने असली प्रश्न आता है – झारखंड के पास आखिर संसाधन कितने हैं?

हम अक्सर इसका उत्तर खनिजों से देते हैं।

निश्चित रूप से झारखंड की सबसे बड़ी आर्थिक पहचान उसकी खनिज संपदा है। लेकिन अगर हम केवल खनिज को संसाधन मानेंगे, तो हम अपने राज्य की वास्तविक क्षमता का बहुत छोटा हिस्सा देख रहे होंगे।

जमीन संसाधन है। पानी संसाधन है। जंगल संसाधन हैं। कृषि संसाधन है। और सबसे महत्वपूर्ण – हमारे लोग और हमारी युवा पीढ़ी भी संसाधन हैं।

इसलिए समग्र विकास का अर्थ होगा कि इन सभी संसाधनों को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़ी हुई आर्थिक शक्ति के रूप में देखा जाए।

खनिज इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।

झारखंड से खनिज निकलता है। लेकिन खनिज का सबसे बड़ा मूल्य केवल उसे जमीन से निकालने में नहीं है। असली संभावना तब पैदा होती है जब उसके साथ value addition जुड़ता है। लौह अयस्क केवल बाहर चला जाए, उससे एक प्रकार का आर्थिक लाभ होगा; लेकिन उसी संसाधन के आसपास processing, steel, engineering, manufacturing और ancillary industries विकसित हों, तो उसी खनिज से पैदा होने वाला आर्थिक मूल्य कई गुना व्यापक हो सकता है।

यानी हमें यह प्रश्न केवल नहीं पूछना चाहिए कि हमारे पास क्या है? हमें यह भी पूछना चाहिए कि हम उससे क्या बना रहे हैं?

और फिर उससे अगला प्रश्न निकलता है – उससे कितना रोजगार पैदा हो रहा है, कितनी आय पैदा हो रही है और राज्य की अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी हो रही है?

यही सोच minor minerals पर भी लागू होती है। कोई संसाधन हमारे अधिकार क्षेत्र में है, तो केवल उसके होने से आर्थिक लाभ सुनिश्चित नहीं हो जाता। उसके बेहतर उपयोग, बेहतर प्रबंधन और बेहतर मूल्य प्राप्त करने की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। Auction में अधिक premium प्राप्त करना केवल संसाधन का प्रश्न नहीं, बल्कि हमारी policy और marketing क्षमता का भी प्रश्न है।

खनिज के विषय में एक और संतुलन जरूरी है।

झारखंड के खनिज झारखंड के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनकी उपयोगिता झारखंड की सीमा पर समाप्त नहीं होती। यहां का कोयला बिजली देता है, लौह अयस्क स्टील बनाता है और स्टील से देश की सड़कें, रेल, उद्योग, मकान और रक्षा तक जुड़ी हुई हैं। इसलिए झारखंड के खनिज और भारत की अर्थव्यवस्था के बीच एक स्वाभाविक संबंध है।

झारखंड को अपनी संपदा का न्यायोचित आर्थिक लाभ मिलना चाहिए। लेकिन इसके साथ यह भी देखना होगा कि हमारी नीतियां ऐसी हों जो निवेश, उद्योग और मूल्य संवर्धन को प्रोत्साहित करें। समृद्ध झारखंड और मजबूत भारत – इन दोनों को साथ लेकर चलना ही व्यावहारिक आर्थिक दृष्टि है।

लेकिन संसाधन की हमारी चर्चा यहां भी समाप्त नहीं होती।

कभी-कभी संसाधन हमारे सामने होते हैं, लेकिन हम उन्हें उस रूप में पहचान नहीं पाते।

भूमि इसका उदाहरण है।

यदि भूमि के रिकॉर्ड व्यवस्थित और नियमित हों, वैध मकानों और संपत्तियों का उचित नियमितीकरण हो और भूमि का अधिक उत्पादक उपयोग संभव हो, तो इससे केवल प्रशासनिक व्यवस्था नहीं सुधरेगी। आर्थिक गतिविधि बढ़ सकती है, संपत्ति का वास्तविक मूल्य सामने आ सकता है और सरकार के राजस्व का आधार भी व्यापक हो सकता है।

इसी तरह पानी को भी हमें केवल एक प्राकृतिक तत्व की तरह नहीं, आर्थिक संसाधन की तरह देखना चाहिए।

एक खुली कोयला खदान में जमा पानी आज किसी के लिए समस्या हो सकता है। लेकिन अगर वही पानी सुरक्षित और वैज्ञानिक तरीके से किसी औद्योगिक गतिविधि में उपयोग हो सकता है, तो वही चीज एक नए आर्थिक और मानवीयअवसर में बदल सकती है।

संसाधन कई बार हमारे पास पहले से होता है; आवश्यकता केवल उसे देखने की दृष्टि बदलने की होती है।

और जब संसाधनों की बात होती है, तो राज्य की वित्तीय क्षमता को भी उसी दृष्टि से देखना होगा।

सरकार के लिए कर्ज कोई असामान्य बात नहीं है। उधार लेकर infrastructure और productive assets बनाना दुनिया भर में सरकारों की आर्थिक व्यवस्था का हिस्सा रहा है। लेकिन एक बात उतनी ही महत्वपूर्ण है – कर्ज के साथ भुगतान की योजना भी होनी चाहिए।

इसके साथ हमें सरकारी व्यय को भी केवल विकास के नाम पर बढ़ाते जाने की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। विकास के लिए खर्च आवश्यक है, लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि हर खर्च की आवश्यकता, उसकी प्राथमिकता और उसकी उपयोगिता पर लगातार विचार हो। सरकार की वित्तीय क्षमता सीमित होती है, इसलिए केवल यह देखना पर्याप्त नहीं कि कितना खर्च किया जा सकता है; यह भी देखना होगा कि कितना खर्च वास्तव में आवश्यक है और कहां खर्च को कम या अधिक कुशल बनाया जा सकता है।

क्योंकि कई बार विकास की चर्चा में अधिक खर्च को ही अधिक विकास मान लिया जाता है। जबकि असली प्रश्न यह है कि जो पैसा खर्च किया गया, उससे कितना परिणाम निकला। यदि किसी परियोजना के लिए धन स्वीकृत हुआ है, तो उसके समय पर पूरा होने, सही तरीके से लागू होने और पूरी क्षमता से उपयोग में आने की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। केवल बजट में प्रावधान हो जाना या राशि खर्च हो जाना अपने आप में विकास का प्रमाण नहीं हो सकता।

झारखंड की देनदारियां पिछले वर्षों में काफी बढ़ी हैं। महामारी के दौरान debt-to-GSDP अनुपात 36 प्रतिशत से ऊपर चला गया था; अब अनुपात कम हुआ है, लेकिन कुल कर्ज का आकार अभी भी महत्वपूर्ण है।

इसलिए चर्चा केवल यह नहीं होनी चाहिए कि कर्ज कितना है। सवाल यह होना चाहिए कि उस कर्ज से क्या बना? उस पर कितना खर्च हुआ, वह काम कितना पूरा हुआ और उसका उपयोग कितनी प्रभावी तरीके से हो रहा है?

क्या ऐसी परिसंपत्तियां बनीं जो आने वाले वर्षों में आर्थिक गतिविधि बढ़ाएंगी? क्या उनसे रोजगार और राजस्व पैदा होगा? क्या वे राज्य की भविष्य की क्षमता को बढ़ाएंगी? और क्या जिन परियोजनाओं पर पैसा लगाया गया है, उनका पूरा लाभ राज्य को मिल रहा है?

क्योंकि सरकारी कर्ज तब अधिक सार्थक होता है जब वह भविष्य की उत्पादक क्षमता बनाता है। और खर्च तब सार्थक होता है जब वह केवल राशि को समाप्त न करे, बल्कि राज्य की क्षमता और लोगों के जीवन में वास्तविक सुधार पैदा करे।

इसी संदर्भ में राज्य की अपनी सीमाओं को भी समझना होगा। झारखंड की अर्थव्यवस्था का आकार अभी अपेक्षाकृत छोटा है। कर राजस्व की अपनी सीमाएं हैं और दूसरी तरफ वेतन, प्रशासनिक खर्च तथा ब्याज जैसी प्रतिबद्धताएं हैं। इसलिए हर अतिरिक्त रुपये का उपयोग कितना productive है, यह प्रश्न और महत्वपूर्ण हो जाता है।

यहां बिहार और छत्तीसगढ़ जैसे पड़ोसी राज्यों के अनुभव और आंकड़े हमारे लिए तुलना से ज्यादा एक संदर्भ प्रदान कर सकते हैं। अलग-अलग राज्यों में debt और revenue की स्थिति अलग है। इसका मतलब यह है कि एक ही नीति हर राज्य के लिए समान परिणाम नहीं देती। अपनी आर्थिक संरचना के अनुसार राजस्व और व्यय के बीच बेहतर संतुलन बनाना पड़ता है।

इसीलिए taxation को भी केवल tax rate बढ़ाने के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।

कई बार कम दर पर अधिक आर्थिक गतिविधि पैदा करना अधिक प्रभावी हो सकता है। यदि कर व्यवस्था ऐसी हो कि कारोबार और खपत बढ़े, formal transactions बढ़ें और tax base विस्तृत हो, तो कुल राजस्व में भी वृद्धि संभव है।

झारखंड में excise और fuel taxation जैसे क्षेत्रों में भी इसी दृष्टिकोण से विचार किया जा सकता है। दूसरे राज्यों के अनुभव हमें यह समझने में मदद कर सकते हैं कि राजस्व केवल दर से नहीं, आर्थिक गतिविधि से भी बनता है।

लेकिन यहां एक और बात उतनी ही महत्वपूर्ण है।

राजस्व जुटाना विकास का अंतिम लक्ष्य नहीं है।

राजस्व का वास्तविक महत्व तब है जब वह लोगों के जीवन और राज्य की productive capacity में दिखाई दे।

खनन प्रभावित क्षेत्रों के लिए DMF इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। झारखंड में इस व्यवस्था के तहत हजारों करोड़ रुपये जमा हुए हैं, लेकिन उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार जमा राशि और वास्तविक खर्च के बीच बड़ा अंतर रहा है।

इससे हमें एक बहुत बुनियादी सवाल पूछना चाहिए – हमारे पास पैसा है या नहीं, यह महत्वपूर्ण है; लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण है कि जो पैसा हमारे पास है, वह जमीन पर कितना दिखाई देता है।

योजना, बजट और प्रावधान तभी विकास बनते हैं जब उनका प्रभाव लोगों तक पहुंचे।

और यहीं शासन की भूमिका आती है।

किसी भी संसाधन की वास्तविक कीमत केवल उसके बाजार मूल्य से तय नहीं होती। उसकी कीमत इस बात से भी तय होती है कि उसे कितनी कुशलता से उपयोग किया गया, उससे कितनी आर्थिक गतिविधि पैदा हुई और उसका लाभ कितने लोगों तक पहुंचा।

इसलिए झारखंड को आगे बढ़ने के लिए शायद किसी एक नए संसाधन की तलाश से ज्यादा अपने मौजूदा संसाधनों के बेहतर उपयोग की संस्कृति विकसित करनी होगी।

हमारे पास खनिज हैं – तो value addition बढ़े।

हमारे पास जमीन है – तो records और utilisation बेहतर हों।

हमारे पास पानी है – तो उसके नए productive उपयोग खोजे जाएं।

हमारे पास वित्तीय संसाधन हैं – तो borrowing productive assets में बदले।

हमारे पास युवा हैं – तो उन्हें केवल नौकरी खोजने वाला नहीं, बल्कि रोजगार पैदा करने वाला economic participant बनाने की परिस्थितियां बनें।

और हमारे पास भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है – तो झारखंड को उससे अपनी ताकत जोड़नी होगी।

यहीं समग्र विकास का अर्थ सामने आता है।

समग्र विकास का अर्थ केवल अधिक सड़कें या अधिक उद्योग नहीं है। इसका अर्थ है – ऐसी आर्थिक व्यवस्था बनाना जिसमें संसाधन से मूल्य (Value) पैदा हो, मूल्य से निवेश हो, निवेश से रोजगार हो, रोजगार से आय बढ़े, आय से बाजार बढ़े और बाजार से राज्य की आर्थिक क्षमता और मजबूत हो।

झारखंड को इसी चक्र को मजबूत करना है।

हमारे सामने आज अवसर भी है और जिम्मेदारी भी।

अलग राज्य के रूप में हमें अपनी प्राथमिकताएं स्वयं तय करने की स्वतंत्रता मिली है। अब आवश्यकता है कि उन प्राथमिकताओं में संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग, वित्तीय अनुशासन, value addition, उद्यमिता, रोजगार और मानव विकास एक-दूसरे से जुड़े हुए दिखाई दें।

झारखंड को केवल इस बात पर गर्व नहीं होना चाहिए कि उसके नीचे कितना खनिज है। उसे इस बात पर गर्व करने की स्थिति बनानी चाहिए कि उस खनिज, उस जमीन, उस पानी, उस जंगल और सबसे बढ़कर अपने मानव संसाधन से उसने कितनी समृद्धि पैदा की।

मेरे विचार में यही वह दिशा है जिसमें झारखंड अपनी अगली आर्थिक पहचान बना सकता है।

संसाधन हमारे पास पहले से हैं। अब आवश्यकता है – सही प्राथमिकता, सही नीति और सही उपयोग की।

तभी संसाधन संपदा से विकास बनेगा, और विकास केवल आंकड़ों में नहीं, झारखंड के लोगों के जीवन में दिखाई देगा।

समृद्ध झारखंड और मजबूत भारत – यही हमारी आर्थिक यात्रा की स्वाभाविक दिशा होनी चाहिए।

संसाधन केवल संपदा नहीं, विकास की संभावनाएं हैं

– महेश पोद्दार
पूर्व सांसद, राज्यसभा

Jharkhand: Resources for Comprehensive Development

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *