खनिज, संघवाद और झारखंड का सवाल

झारखंड में खनिज केवल जमीन के नीचे दबा प्राकृतिक संसाधन नहीं है। यह राज्य की अर्थव्यवस्था, रोजगार और खनन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के जीवन से जुड़ा प्रश्न है। इसलिए MMDR संशोधन अधिनियम, 2026 को लेकर उठ रही चिंता स्वाभाविक है। लेकिन चिंता और भ्रम में फर्क होता है। इस कानून पर बहस नारों से नहीं, तथ्यों से होनी चाहिए।

इस संदर्भ में जीएसटी लागू होने के समय संसद में कही गई एक बात याद आती है। जब देश के भीतर की 28 सीमा-दीवारें हटाई जा सकती हैं, तो इससे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी। आज उसके परिणाम हमारे सामने हैं। राज्यों की सीमाओं के बीच आर्थिक बाधाएं कम होने से देश की अर्थव्यवस्था ने जिस गति से विस्तार किया है, वह इस बात का प्रमाण है कि एकीकृत आर्थिक व्यवस्था का लाभ पूरे देश को मिलता है।

विवाद की पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट का 2024 का ऐतिहासिक फैसला है। मिनरल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाम सेल मामले में नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 8:1 के बहुमत से कहा कि रॉयल्टी टैक्स नहीं है और खनिज अधिकारों पर कर लगाने की राज्यों की विधायी शक्ति को मान्यता दी। झारखंड ने इसी आधार पर मिनरल बियरिंग लैंड सेस लगाया। इसका महत्व समझिए—राज्य सरकार ने 2026-27 के बजट में इस सेस से 14,656 करोड़ रुपए की आय का अनुमान लगाया है। इसलिए झारखंड की राजस्व संबंधी चिंता वास्तविक है।

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने, खनन प्रभावित जिलों के विकास के लिए यह राशि राज्यों और जिलों तक पहुंचाने की व्यवस्था की। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज इस व्यवस्था पर सवाल और आपत्तियां उठाने वालों में वे लोग भी शामिल हैं, जिन्होंने दशकों तक देश पर शासन किया, लेकिन इस समस्या को समझने और खनन प्रभावित क्षेत्रों तक इस व्यवस्था का लाभ पहुंचाने के लिए अपेक्षित पहल नहीं की। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी जनता को जानना चाहिए। खनन प्रभावित क्षेत्रों को खनिज संपदा का प्रत्यक्ष लाभ मिले, इसके लिए केंद्र सरकार ने 2015 में MMDR कानून में संशोधन कर डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन (DMF) को वैधानिक आधार दिया। इसका सिद्धांत था—जिस क्षेत्र की धरती खनन का बोझ उठाती है, खनिज से पैदा हुई समृद्धि का एक हिस्सा वहां के लोगों तक वापस पहुंचना चाहिए। DMF का पैसा केंद्र से मिलने वाला अनुदान नहीं, बल्कि खनन कंपनियों का वैधानिक अंशदान है। अप्रैल 2025 तक झारखंड में DMF के तहत 13,791 करोड़ रुपए से अधिक जमा हो चुके थे। लेकिन इनमें वास्तविक खर्च करीब 6,679 करोड़ रुपए था। यानी संग्रहित राशि का आधा भी तब तक जमीन पर खर्च नहीं हुआ था।

डीएमएफ की राशि के उपयोग का अनुभव भी पूरी तरह संतोषजनक नहीं रहा है। बोकारो जैसे खनन क्षेत्र में इस राशि से अपेक्षित जनसुविधाएं और विकास दिखाई नहीं दिए। राशि के उपयोग को लेकर गंभीर सवाल और अनियमितताओं के आरोप भी सामने आए, लेकिन समय बीतने के साथ वे फाइलों में दबे रह गए। यदि राज्य सरकार ने इस पूरे विषय की नियमित निगरानी और प्रभावी पर्यवेक्षण किया होता, तो संभव है कि आज उन क्षेत्रों में विकास का प्रभाव कहीं अधिक दिखाई देता।

इसलिए सवाल केवल यह नहीं कि झारखंड को नया सेस लगाने की कितनी स्वतंत्रता मिले। सवाल यह भी है कि खनन प्रभावित लोगों के लिए पहले से उपलब्ध हजारों करोड़ रुपए का पूरा और प्रभावी उपयोग क्यों नहीं हो पाया? अब 2026 के संशोधन को समझिए। झारखंड का कोयला केवल झारखंड को बिजली नहीं देता और यहां का लौह अयस्क केवल यहां के कारखानों में इस्तेमाल नहीं होता। खनिज स्टील, बिजली, रेलवे, सड़क, आवास, रक्षा और भारत की मैन्युफैक्चरिंग अर्थव्यवस्था की बुनियाद हैं। ऐसे में यदि हर खनिज उत्पादक राज्य अपनी अलग दरों से टैक्स और सेस लगाए, तो देश में अलग-अलग और अनिश्चित कर व्यवस्थाएं खड़ी हो सकती हैं।

नया प्रावधान इसी अनिश्चितता को नियंत्रित करता है। खनिज अधिकारों और खनिज वाली भूमि पर राज्यों के टैक्स तथा सेस को केंद्र द्वारा निर्धारित शर्तों और सीमाओं के भीतर रहना होगा। इसे केवल राज्यों का अधिकार छीनना कहना इसलिए अधूरी व्याख्या होगी। खदान पर बढ़ी लागत वहीं समाप्त नहीं होती। लौह अयस्क महंगा होगा तो स्टील की लागत बढ़ेगी। खनिज महंगे होंगे तो सड़क, रेल, बिजली, उद्योग और मकान तक उसका असर पहुंचेगा। अंततः कीमत अर्थव्यवस्था और आम नागरिक चुकाते हैं।

इसका अर्थ यह नहीं कि झारखंड अपने अधिकारों की चिंता छोड़ दे। खनन का पर्यावरणीय और सामाजिक बोझ राज्य उठाता है। इसलिए उसे अपनी खनिज संपदा का न्यायोचित आर्थिक लाभ मिलना ही चाहिए। लेकिन उचित हिस्सेदारी और अनियंत्रित कराधान एक ही बात नहीं हैं। इसी तरह खनिज कर व्यवस्था में बदलाव को आदिवासी जमीन के अधिकार खत्म होने के रूप में प्रस्तुत करना भी उचित नहीं है। जमीन का स्वामित्व, अधिग्रहण और अनुसूचित क्षेत्रों तथा आदिवासी हितों की संवैधानिक-कानूनी सुरक्षा अलग विषय हैं। यदि झारखंड सरकार को लगता है कि संशोधन से राज्य को अनुचित आर्थिक नुकसान होगा, तो उसके पास संवाद, वैकल्पिक राजस्व व्यवस्था का प्रस्ताव और आवश्यकता पड़ने पर न्यायिक समीक्षा जैसे संवैधानिक रास्ते उपलब्ध हैं। आंदोलन लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन आंदोलन कानून की पूरी तस्वीर बताने का विकल्प नहीं हो सकता। झारखंड को अपने खनिजों का उचित लाभ अवश्य मिलना चाहिए। साथ ही यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि खनन प्रभावित लोगों के नाम पर पहले से उपलब्ध हजारों करोड़ रुपए का पूरा लाभ उन तक कब पहुंचेगा?

बहस ‘झारखंड बनाम दिल्ली’ की नहीं, समृद्ध झारखंड और मजबूत भारत की होनी चाहिए। असल संघवाद दोनों को साथ लेकर चलने का नाम है।

महेश पोद्दार
पूर्व सांसद, राज्यसभा

Minerals, Federalism and the Jharkhand Question

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